Friday, September 11, 2009

"....ये मेरा खुदा "




....और फिर
अपनी ही उनींदी परछाईं में
मैंने उसे देखा
इक ख्वाब के अहसास सा

कुंवारी बर्फ सी सफेदी लिए
हवाओं में खुशबू कि तरह
सब तरफ बिखरता हुआ सा


और फिर महसूसा ...
रूह की गहराई में दूsssर तक उतरते
एक चुप्प सी खामोशी बनकर ....हौले हौले !!

ये मेरा खुदा
तुम्हारे खुदा से यूँ अलग सा क्यूँ है ?

6 comments:

  1. आपकी लेखन शैली का कायल हूँ. बधाई.

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  2. ये मेरा खुदा
    तुम्हारे खुदा से यूँ अलग सा क्यूँ है ?
    बेहतरीन लिखा है आपने. बहुत सुन्दर

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  3. ये मेरा खुदा तुम्हारे खुदा से यूँ अलग सा क्यूँ है ?
    खुदा तो एक वही रहा होगा ...फर्क बंदगी का रहा होगा ..!!

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  4. इसलिए कि हर इंसान का खुदा अलग होता है। हर कोई अपने लिए अलग खुदा गढ़ता है।

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