
विश्वास एक ज़मीं का
एहसास इक ज़मीं का
संत्रास इक ज़मी का;
...........................तोड़ने लगता है
शिराएँ अंतर्मन की
रोकने लगता है धाराएं मन-प्रवाह की ;
दो गुनी ताक़त से
सर उठाती है अस्मिता
हौसले और सर चढ़ जाते हैं
जिजविषा पीठ छूकर
अस्तित्व निखारती है तब तब !
क्षितिज तक पहुँचने से पहले
ना ज़मीं , ना आसमान
कुछ नही छूटता !