Friday, October 9, 2009

मैं का टूटना... हम हो जाना..... दर्द है !!



मैं का टूटना
हम हो जाना
दर्द है
तपती सांकल की तरह
ना छुअन की संभावना
ना ही खुल जाने की आस

बंद होती हथेली पर
पूर्ण और अपूर्ण के दरम्यान
भीड़ सा हो जाने का अहसास
सर उठाता है ..
चुभता रहता है
तीखी किरचों की तरह
एकाकीपन आँख बंद करता है
( अंधों से परिचय भी हो तो कितना )

टूटना
बिखरना
परिभाषाएं खो देना
कब हुए पर्याय - जुड़ जाने के ?

कब हुआ करीब आना
दूर....
बहुत दूर हो जाना खुद से ?

रौशनी से ज्यादा नजदीकी - हमेशा अँधेरा ही क्यों होती है ?

प्रश्नों की दूब पर
ओस बन के कोई उत्तर
उतरे ना उतरे...
स्तिथि मात्र यही है ...
मैं का टूटना हम हो जाना
दर्द है
स्वीकारना होगा
दर्द की तरह !!!

4 comments:

  1. टूटना
    बिखरना
    परिभाषाएं खो देना
    कब हुए पर्याय - जुड़ जाने के ?

    मैं का ताउम्र मै को ही टुकड़े-टुकड़े तराशते रहना, जोड़्ते रहना, तलाशते रहना भी उतना ही दर्द है..
    शब्द-विन्यास ऐसा है जैसे कि काँच का कीमती गुलदस्ता छन्‌ से फ़र्श पर टूट कर बिखर गया हो...अद्भुत

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  2. सुन्दर रचना है बधाई।

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  3. बेहतरीन अभिव्यक्ति..सुंदर रचना..बधाई

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  4. बहुत ही उम्दा रचना।

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