Saturday, February 6, 2010

"मैं मगर हारा नहीं हूँ...."



थक गया हूँ मैं भले ही
मैं मगर हारा नहीं हूँ...
वक़्त हो कितना भी कातिल
वक़्त का मारा नहीं हूँ !!

दीप मेरा आँधियों में लड़खड़ाता ही सही
पर जल रहा है....
हौसला बोझिल हुआ सा डगमगाता ही सही
पर चल रहा है !

रौशनी की लकीरें कुछ दिखें या न सही ,
घबरा के दम को घोंट लूं , मैं वो अँधियारा नहीं हूँ
थक गया हूँ मैं भले ही, मैं मगर हारा नहीं हूँ !!

नाव मेरी इस भंवर में फस चुकी हो भले
डूबी नहीं है...
डाली डाली बागबाँ की छितरी पड़ी हो भले
सूखी नहीं है !

ज्वार ऊँचा हो भले आकाश से, होता रहे
इस प्रलय में डूब जाऊं, सागर का वो किनारा नहीं हूँ ...
थक गया हूँ मैं भले ही, मैं मगर हारा नहीं हूँ !!

6 comments:

  1. सागर जी इस सकारात्मक सोच वाली विलक्षण रचना के लिए दिल से बधाई कबूल करें...वाह...आनंद आ गया पढ़ कर.

    नीरज

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  2. इस प्रेरणादायी रचना के रचना सौन्दर्य ने जितना मुग्ध किया, उतनी ही इसकी उर्जा ने अपार मनोबल दिया...
    नतमस्तक हूँ आपके भावों और रचना सौष्ठव के सम्मुख...

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  3. भई वाह.... मजेदार रचना ........बहुत बहुत बधाई !

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  4. थक गया हूँ मैं भले ही
    मैं मगर हारा नहीं हूँ...
    वक़्त हो कितना भी कातिल
    वक़्त का मारा नहीं हूँ !!
    सकारात्मक सोच लिये सुन्दर अभिव्यक्ति शुभकामनायें

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  5. आपकी रचना बहुत सुन्दर है!
    यह चर्चा मंच में भी चर्चित है!
    http://charchamanch.blogspot.com/2010/02/blog-post_5547.html

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  6. ज्वार ऊँचा हो भले आकाश से, होता रहे
    इस प्रलय में डूब जाऊं, सागर का वो किनारा नहीं हूँ ...
    थक गया हूँ मैं भले ही, मैं मगर हारा नहीं हूँ !!

    बहुत खूब ......!!
    आपकी इस रचना से प्रेरणा मिलेगी ......!!

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