
कहाँ थे तुम
जब पुकारा था तुम्हें
मेरे दर्द ने ?
कहाँ थे तुम
जब दिन भर ये नम आँखे
हर किसी सूरजमुखी कि पंखुडी
टटोल रही थी ,
हर गली -हर मकान के मुंडेरों पर
घुटनों के बल चल चल
मेरी हर सांस
तुम्हारी ही किसी छूट गयी परछाईं कि टोह में
इधर उधर डोल रही थी...
कहाँ थे तुम
जब रात रात भर की जगी
अंधी बहरी सड़कों पर
मेरी उदासी
ढूंढा किये थी
तुम्हारे होठों से गिरी किसी मुस्कुराती रोशनी की लकीर को !
कहाँ थे तुम ?
जब बदहवासी ने मेरी
तन अपना फाड़ कर
तुम्हें आने के लिए लिखा था ....
अब आये हो ?
इत्ती देर में आये हो ?
चलो ....
मेरा दर्द
नम आँखें
भरभराती साँसे
मेरी उदासी और मेरा तन
तमाम सब मिल कर तुम्हे ढूँढने गए हैं
आते ही होंगे ....!
तुम बैठो तो सही ! !